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रचनाकार आलोक शर्मा जी द्वारा लिखा गया लॉकडाउन में जागरूकता के लिए कविता

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महराजगंज:-

जनपद के विशोखोर के रहने वाले चर्चित रचनाकार आलोक शर्मा जी के द्वारा आये दिन नई – नई कविताये लिखी जाती है ।इसी क्रम में आज एक बार फिर वैष्विक महामारी के दौर में कोरोना से बचने के लिए लोगो को अपने कविताओ के माध्यम से जागरूक करने के लिए एक और कविता पेश किया है ।इनके द्वारा आये दिन जरूरतमंदों की हर तरह से सहायता करते हुए भी देखा जाता है ।

आज की कविता

 

का मितवा! अब्बो ना मनबे,*

कलिहें खइले रोल पुलिस के,
आजु सुबहियें चाटा;
*का मितवा! अब्बो ना मनबे,*
*करबे सैर सपाटा!*

रोज भिनहिये से संझा तक,
कहाँ ते जाले घर से;
जन-जन जहाँ लुकाइल बाटे,
काल कहर के डर से!
ई मनमानी फेरि दी पानी,
कइसे भरबे घाटा;

*का मितवा! अब्बो ना मनबे,*
*करबे सैर सपाटा!*

कब्बो बान्हि सिलिंडर पीछे,
कब्बो दवा के पुर्जी;
झूठे ते भरमावत बाड़े,
हाथ मे लेके सब्जी!
जान बचइबे तब्बे खइबे,
लउकी, कटहर, भांटा;

*का मितवा! अब्बो ना मनबे,*
*करबे सैर सपाटा!*

ग्यानी दुनिया ग्यान के मद में,
कइलस काल के खोज;
भूलि गइल जग नियम धरम,
आ कइसन होला भोज!
खाये लगलें सांप, छछुंनर,
गादुल, चुइटी, मांटा;

*का मितवा! अब्बो ना मनबे,*
*करबे सैर सपाटा!*

घास के रोटी राणा खइलें,
खाले नून आ चावल,
लेकिन भयवा निम्मन नइखे,
कुकुरे नियर धावल;
देख जगत में मउत कइसन,
पसरल बा सन्नाटा;

*का मितवा! अब्बो ना मनबे,*
*करबे सैर सपाटा!*

*रचनाकार आलोक शर्मा  महराजगंज*

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